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अजंता भाग २

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  अजंता भाग २  अजंता की चित्र कला से तत्कालीन संस्कृति, समाज और धार्मिकता की एक गहन समझ प्राप्त होती है । दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 5 वीं शताब्दी  के बीच के समय के भारत के विषय में विभिन्न विद्वानों ने  गहन अध्ययन, समाजशास्त्र , इतिहास और दक्षिण एशिया के नृविज्ञान के दृष्टिकोण की विभिन्न व्याख्याएँ  की है। यहाँ पोशाक, गहने, संबंध एवं  सामाजिक गतिविधियों का और कुलीन वर्ग की जीवन शैली का प्रदर्शन किया गया है, और आम आदमी, भिक्षुओं और ऋषि की वेशभूषा को भी दर्शाया गया है। अजंता के एवं उनमें वर्णित  भगवान् बुद्ध से सम्बंधित चित्रों की कहानियों को हमने पिछले ब्लॉग में जाना यदि आपने मेरा वो ब्लॉग नहीं पढ़ा है तो कृपया पहले उसे पढ़ लें। लिंक -  https://art.artisttech.co.in/2021/10/blog-post_14.html अब हम अजंता से सम्बंधित मुख्य विन्दुओं को जान लेते हैं - * अजंता की गुफायें भारत में महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद शहर से 106 कि॰मी॰ दूर स्थित  हैं । ये  तकरीबन 29 चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। एवं यहाँ ३० गुफाएं हैं जो बघोर नदी के किनारे स्थित हैं।  * अंतिम गुफा 15ए को 1956 में ही खोजा गया और अभी तक

अजंता भाग १

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अजंता भाग १  आज मैं आपको भारत के चित्रकारी के ह्रदय से मिलाने का प्रयास करने वाली हूँ,  क्या आप अनुमान लगा सकते हैं, शायद सभी समझ गये होंगे कि मैं किसकी बात कर रही हूँ। जी- मैं बात कर रही हूँ अजंता की अप्रतिम अपरिहार्य एवम् अपने युग की अविस्मरणीय चित्रकारी की।  इनकी चित्रकारी को समझने के लिए हमें सूक्ष्म में भगवान बुद्ध का जीवन परिचय जान लेना चाहिए, इससे न केवल हम गहराई से इसके महत्व को समझ पायेंगे बल्कि विद्यार्थी आसानी से इनकी चित्रकारी के नाम भी याद कर पायेंगे। मैं कहानी के साथ जो मुझे स्मरण में आ रहे हैं उन सभी चित्रों के नाम भी अंकित करती जाऊँगी और एक बार पुनः जब उनको गुफाओं के नंबर के साथ दोहराऊंगी तो आपको ये नाम आसानी से याद हो जायेंगे। इसके अलावा आपको अन्य भी रोचक प्रश्नों के उत्तर मिलते जायेंगे अतः आप इस ब्लॉग को पूरा पढ़ें - भगवान् बुद्ध जिनका वास्तविक नाम सिद्धार्थ था एवं वे राजा शुद्धोधन के पुत्र थे।  उनकी जन्म देने वाली माँ - मायादेवी थीं एक दिन जब बुद्ध गर्भ में थे तो उन्हें स्वप्न में कमल के दर्शन हुए ( मायादेवी का स्वप्न (चित्र )), सिद्धार्थ को जन्म देने के बाद संभवतः ७

खजुराहो मंदिर

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खजुराहो मंदिर  हमारे देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है खजुराहो मंदिर - पहले इस शहर के नाम के बारे में जानते हैं - मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो का इतिहास काफी पुराना है। खजुराहो का नाम खजुराहो इसलिए पड़ा क्योंकि यहां खजूर के पेड़ों का विशाल बगीचा था। खजिरवाहिला से नाम पड़ा खजुराहो। इब्नबतूता ने इस स्थान को कजारा कहा है, तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भाषा में इसे ‘चि: चि: तौ’ लिखा है। अलबरूनी ने इसे ‘जेजाहुति’ बताया है, जबकि संस्कृत में यह ‘जेजाक भुक्ति’ बोला जाता रहा है। कई अनसुलझे रहस्यों से भरा है  यहां का इतिहास और इसे समझने के लिए हम  यहां के मंदिरों के विषय में जो एक इतिहास प्रचलित है उसको जान लेते हैं यदि आप इस स्थान पर जाएँ तो आप एक लाइट एंड साउंड शो भी देख सकते हैं जो कि  प्रस्तुत इतिहास के विषय में बताता है -   अपनी अद्भुत कलाकृतियों और कामोत्तेजक मूर्तियों के लिए विश्व भर में प्रसिद्द यह खजुराहो के मंदिर के निर्माण से लेकर एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जिसके मुताबिक काशी के प्रसिद्द ब्राहा्ण की पुत्री हेमावती, जो कि बेहद खूबसूरत थी। एक दिन नदी में स्नान

Sigmund Freud’s Journey from ‘Libido’ Theory to the ‘Unconscious’ Theory in Art

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  .. Sigmund Freud’s Journey from ‘Libido’ Theory to the ‘Unconscious’ Theory in Art link -   Author Ridhi Sarraf  Riddhima    International renowned artist and awarded with fellowship by culture ministry of India From time to time all art and aesthetics reflect the current intellectual trends of their time. Sigmund Freud of Austria, a revolutionary, the great physician of the human mind, the founder of psychoanalysis, was not only a neurologist, psychiatrist, but also a philosopher, writer, poet. In short, he did not leave any subject untouched. Sigmund Freud discussed psychoanalysis as a way to deal with psychopaths and as an intellectual discipline.    A kind of upheaval or revolution of ideas was by Sigmund Freud a medical man who founded the science of psychoanalysis. Psychoanalysis initially emerged as a technique to treat mental illness, which was related to mental diseases. Then Freud tried to probe deeper into the unknown realm of the unconscious and was successful in this. Fr

World Art Day 15th April

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                                                              ..                     World Art Day 15th April  जब हम एलन मस्क का नाम लेते हैं तो एक शख्श ध्यान में आता है जो पचास साल आगे देख सकता है एक अद्भुत वैज्ञानिक है , लेकिन अगर में कहूँ कि १५वीं शती में एक ऐसा वैज्ञानिक भी हुआ है जो ५०० वर्ष आगे देख सकता था , और उसने ऐसे चित्र बनाये जो इसका प्रमाण हैं.. मेरी बात से क्या आप उस शक्श को पहचान पा रहे हैं - अच्छा मैं कुछ और भी कहती हूँ - यदि मैं आपको  एक ऐसे व्यक्ति के बारे में कहूँ जो -  पेंटर,स्कल्पटर ,आर्किटेक्ट , मैथमेटिशियन , इनजीनियर , खगोलशास्त्रि  , भूवैज्ञानिक , शरीररचना-विज्ञानी, वनस्पति -विज्ञानी भी था और उसने ख़ास शिक्षा भी नहीं ली थी।   अभी भी नहीं -  अच्छा ठीक है-  मैं ही बताती   हूँ - उनका नाम है - लियनार्डो दा विन्सी , जिसका नाम लियोनार्डो डि सेर पिएरो दा विंची है - और उनका जन्म 15 अप्रैल 1452 को विंची के टस्कन पहाड़ी शहर में इटली में हुआ था। इनके जन्म दिन को विश्व कला दिवस १५ अप्रेल को मनाया जाता है।   आइये आप और मैं उनके बारे में थोड़ा और जानते हैं -  * क्या आप जानते है

Gratitude

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.. more and more layers and then nature - just like after a long tour - I'm back to home and taking a rest.                

विष्णुधर्मोत्तर पुराण और कला

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 ..  विष्णुधर्मोत्तर पुराण और कला  भारत में चित्रकला का एक प्राचीन स्रोत विष्णुधर्मोत्तर पुराण है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण मार्कण्डेय द्वारा रचित है। इसमें लगभग १६ हजार श्लोक हैं जिनका संकलन ६५० ई. के आस-पास हुआ। इसके तीन खण्ड हैं। प्रथम खण्ड में २६९ अध्याय हैं, द्वितीय खण्ड में १८३ अध्याय तथा तृतीय खण्ड में ११८ अध्याय हैं। विष्णुधर्मोत्तर पुराण के 'चित्रसूत्र' नामक अध्याय में चित्रकला का महत्त्व इन शब्दों में बताया गया है-                            कलानां प्रवरं चित्रम् धर्मार्थ काम मोक्षादं।                            मांगल्य प्रथम् दोतद् गृहे यत्र प्रतिष्ठितम् ॥ कलाओं में चित्रकला सबसे ऊँची है जिसमें धर्म, अर्थ, काम एवम् मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः जिस घर में चित्रों की प्रतिष्ठा अधिक रहती है, वहाँ सदा मंगल की उपस्थिति मानी गई है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण एक उपपुराण है। इसकी प्रकृति विश्वकोशीय है। कलाओं के अतिरिक्त इसमें ब्रह्माण्ड, भूगोल, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, काल-विभाजन, कुपित ग्रहों एवं नक्षत्रों को शान्त करना, प्रथाएँ, तपस्या, वैष्णवों के कर्तव्य, कानून एवं राजनीति, युद्ध

K. G. Subramanyan

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 .. * कला एक संसार नहीं लेकिन यदि हमें संसार को समझना है तो कला  हमें तैयार करती है...  * ‘I am a restless soul’ * “To stoop down and kiss the earth. Between the skyward sprouts And the leaves that fall to earth Revolves the endless tale Of birth and life and death.” K. G. Subramanyan was born in 1924 in Kuthuparambain Kerala, India and studied economics at Presidency College, Madras.  The turning point of his life as an artist came when he visited Santiniketan to study at Kala Bhavan, the art faculty of Visva Bharati University in 1944 under the guidance of Nandalal Bose, Benode Behari Mukherjee and Ramkinkar Baij. K.G. Subramanyan was greatly influenced by folk art from Kerala, Kalighat painting and Pattachitra from Bengal and Odisha, as well as Indian court paintings.  His visual language combines a variety of elements like art principles of European Modernism and folk expression. He is known as a painter, muralist, sculptor, printmaker, set designer and toy maker. Subramanyan’s wor

Indus Valley Civilization in Hindi

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 .. Indus Valley Civilization  सिंधु घाटी सभ्यता की तुलना अब मिस्र और मेसोपोटामिया की कहीं अधिक प्रसिद्ध संस्कृतियों के साथ की जाती है, लेकिन यह एक हालिया विकास है। सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्विक उत्खनन, तुलनात्मक रूप से देर से शुरू हुआ था, और अब यह सोचा गया है कि मिस्र और मेसोपोटामिया के लिए जिम्मेदार कई उपलब्धियाँ  वास्तव में सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों से संबंधित हो सकती हैं। सभ्यता के शहरों को उनके शहरी नियोजन, पके हुए ईंट के घरों, विस्तृत जल निकासी प्रणालियों, जल आपूर्ति प्रणालियों, बड़ी गैर-आवासीय इमारतों के समूहों और हस्तकला में नई तकनीकों (कारेलियन उत्पादों, सील नक्काशी) और धातु विज्ञान (तांबा, कांस्य, सीसा और टिन ) के लिए जाना जाता था।  सिंधु घाटी सभ्यता एक सांस्कृतिक और राजनीतिक इकाई थी जो भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी क्षेत्र में पनपी थी। 7000 -  600 ई.पू. इसका आधुनिक नाम सिंधु नदी की घाटी में स्थित है, लेकिन इसे आमतौर पर सिंधु-सरस्वती सभ्यता (वैदिक स्रोतों में उल्लिखित सरस्वती नदी के बाद जो सिंधु के निकट बहती है) और हड़प्पा सभ्यता के रूप में भी जाना जाता है। इस क्षेत्र में प