देवनागिरी की जन्मदात्री ब्राह्मी लिपि

देवनागिरी की जन्मदात्री ब्राह्मी लिपि

देवनागिरी वैदिक भाषा कही जाती है लेकिन इसका उद्भव ब्राह्मी लिपि से माना जाता है। आइये आज के ब्लॉग में हम इससे जुड़े कुछ तथ्यों को जानते हैं -



"वेद" या "वैदिक वाङ्मय" के लिए प्रचलित "श्रुति" शब्द के आधार पर अनेक पाश्चात्य पंडितों ने सिद्धांत निकाला है कि "दशोपनिषद्काल " तक निश्चय ही भारत में लेखनविद्या या लिपिकला का अभाव था। वैदिक वाङ्मय का अध्यापन गुरु शिष्य की मुख परंपरा और स्रवण परंपरा से होता था। लिपि का अभाव ही उसका मुख्य कारण था।

प्राचीनतम लिपि -

प्राचीन भारत की दो लिपियों में "खरोष्ठी" दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी और ब्राह्मी बाएँ से दाएँ। प्राय: यहाँ के पश्चिमोत्तर सीमाप्रदेशों (पंजाब, कश्मीर) में ही प्राचीन काल में खरोष्ठी का प्रचार था। दूसरी लिपि "ब्राह्मी" का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। भारतीयों की परंपरागत मान्यता के अनुसार संस्कृत भाषा और ब्राह्मीलिपि का प्रवर्तन सृष्टिकर्ता "ब्रह्मा" द्वारा आरंभिक युग में हुआ।

ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मी लिपि १0,000 साल पुरानी है लेकिन यह भी कहा जाता है कि खरोष्ठी लिपि उससे भी ज्यादा पुरानी है।

 महान सम्राट अशोक ने ब्राह्मी लिपि को धम्मलिपि नाम दिया था। ब्राह्मी लिपि को देवनागरी लिपि से भी प्राचीन माना जाता है। कहा जाता है कि यह प्राचीन सिन्धु-सरस्वती लिपि से निकली लिपि है। हड़प्पा संस्कृति के लोग सिंधु लिपि के अलावा  इस लिपि का भी इस्तेमाल करते थे, तब संस्कृत भाषा को भी इसी लिपि में लिखा जाता था।

जैन पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सभ्यता को मानवता तक लाने वाले पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की एक बेटी थी जिसका नाम ब्राह्मी था और कहा जाता है कि उसी ने लेखन की खोज की। यही कारण है कि उसे ज्ञान की देवी सरस्वती के साथ जोड़ते हैं। हिन्दू धर्म में सरस्वती को शारदा भी कहा जाता है, जो ब्राह्मी से उद्भूत उस लिपि से संबंधित है।

प्राचीनतम भाषा -

संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। 'संस्कृत' का शाब्दिक अर्थ है 'परिपूर्ण भाषा'। संस्कृत से पहले दुनिया छोटी-छोटी, टूटी-फूटी बोलियों में बंटी थी जिनका कोई व्याकरण नहीं था और जिनका कोई भाषा कोष भी नहीं था। कुछ बोलियों ने संस्कृत को देखकर खुद को विकसित किया और वे भी एक भाषा बन गईं।


प्राचीनतम अवशेष -

केरल के एर्नाकुलम जिले में कलादी के समीप कोट्टानम थोडू के आसपास के इलाकों से मिली कुछ कलात्मक वस्तुओं पर ब्राह्मी लिपि खुदी हुई पाई गई है, जो नवपाषाणकालीन है। यह खोज इलाके में महापाषाण और नवपाषाण संस्कृति के अस्तित्व पर प्रकाश डालती है। पत्थर से बनी इन वस्तुओं का अध्ययन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वैज्ञानिक और केरल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पुरातत्वविद डॉ. पी. राजेन्द्रन द्वारा किया गया। ये वस्तुएं एर्नाकुलम जिले में मेक्कालादी के अंदेथ अली के संग्रह का हिस्सा हैं। राजेन्द्रन ने बताया कि मैंने कलादी में कोट्टायन के आसपास से अली द्वारा संग्रहीत कलात्मक वस्तुओं के विशाल भंडार का अध्ययन किया। इन वस्तुओं में नवपाषणकालीन और महापाषाणकालीन से संबंधित वस्तुएं भी हैं। उन्होंने बताया कि नवपाषाणकलीन कुल्हाड़ियों का अध्ययन करने के बाद पाया गया कि ऐसी १८ कुल्हाड़ियों में से ३  पर गुदी हुई लिपि ब्राह्मी लिपि है। 

सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में अंकित प्रमुख अभिलेख-

रुम्मिनदेई - स्तम्भलेख

गिरनार - शिलालेख

बराबर - गृहालेख

मानसेहरा - शिलालेख

शाहबाजगद्री - शिलालेख

दिल्ली - स्तम्भलेख

गुजरर - लघु-शिलालेख

मस्को- शिलालेख

कान्धार - द्विभाषी शिलालेख


अतः -  

शोधकर्ताओं के अनुसार देवनागरी, बांग्ला लिपि, उड़िया लिपि, गुजराती लिपि, गुरुमुखी, तमिल लिपि, मलयालम लिपि, सिंहल लिपि, कन्नड़ लिपि, तेलुगु लिपि, तिब्बती लिपि, रंजना, प्रचलित नेपाल, भुंजिमोल, कोरियाली, थाई, बर्मेली, लाओ, खमेर, जावानीज, खुदाबादी लिपि, यूनानी लिपि आदि सभी लिपियों की जननी है ब्राह्मी लिपि।

अब इससे जुड़े मुख्य बिंदुओं को जाने - 

* लगभग सभी लिपियाँ ब्राह्मी लिपि से व्युत्पन्न हैं।

* सभी ध्वन्यात्मक हैं एवं कवर्ग, चवर्ग आदि में बंटे हैं।

* सभी के लिखने में मात्रा का प्रयोग होता है।

* सबके वर्ण रूप में काफी मिलते हैं। मात्राएँ भी बहुत सीमा तक मिलतीं हैं।

* सब में संयुक्ताक्षरों का प्रयोग होता है।

* सब में वर्णों की संख्या लगभग समान है।

* सभी लिपियाँ बाएँ-से-दाएँ लिखी जातीं हैं।

ब्राह्मी लिपि को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। जेम्स प्रिंसेप ईस्ट इण्डिया कम्पनी में एक अधिकारी के पद पर नियुक्त था। इसने वर्ष १८३८ ई. ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों को पढ़ने में सफलता प्राप्त की थी। उन्होंने ही सर्वप्रथम ‘साँची के स्तूप’ पर अंकित ब्राह्मी अक्षरों में ‘ दानं ’ शब्द को पढ़ा तथा इसी शब्द के आधार पर जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि कि वर्णमाला तैयार की।

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