बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के प्रमुख चित्रकार भाग - 4

 

बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के प्रमुख चित्रकार 

   भाग - 4


देवी प्रसाद रॉय चौधरी -




देवी प्रसाद रॉय चौधरी का जन्म 15 जून 1899 को ब्रिटिश भारत (वर्तमान बांग्लादेश में) के अविभाजित बंगाल के तेज हाट, रंगपुर में हुआ था और उन्होंने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई यहीं से की थी।  देवीप्रसाद रॉय चौधरी का पालनपोषण जमींदार घराने में ठाठ बाट में हुआ ,जमींदार परिवार में जन्मे देवीप्रसाद  राय चौधरी का रुझान बचपन से ही कला की तरफ़ था,उनकी कला प्रतिभा को देखने पर उनके पिता उनको अवनींद्र नाथ टैगोर के पास ले गए। इसके बाद चित्रकला में उनके पहले गुरु बने प्रसिद्ध चित्रकार व कलागुरु अबनिंद्रनाथ टैगोर। वहीँ मूर्तिकला में उनके पहले गुरु थे हीरामणि चौधरी। कलकत्ता के बाद वे आगे के प्रशिक्षण के लिए इटली चले गए। इस अवधि के दौरान उनकी कला पर पश्चिमी प्रभाव की शुरुआत हो चुकी थी। भारत लौटकर वे उस बंगाल स्कूल शैली से जुड़ गए जिसे भारतीय कला के पुनर्जागरण के तौर पर देखा जाता है । 1928 में एक छात्र के तौर पर वे तत्कालीन मद्रास के मद्रास कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स से जुड़े, जहाँ बाद में उन्होंने एक अध्यापक से लेकर विभाग के प्रमुख, उप-प्राचार्य और प्रिंसिपल की भूमिका को भी अंजाम दिया। 

देवी प्रसाद राय चौधरी की ख्याति मूर्तिकला में अधिक मिली,आपकी मूर्तिशिल्प कला के बारे में कहा जाता है कि उनके सामने मिट्टी भी मौन हो जाती थी और फिर उनकी उंगलियों के स्पर्श मात्र से किसी रूप को धारण कर लेती थी। 

मूर्ति निर्माण में नसों,मांसपेशियों और शरीर के गठन पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस प्रकार की मूर्ति में "स्नान करती हुई नारी की मूर्ति " उल्लेखनीय है आपकी मूर्तिशिल्प में रोडिन और बोडरडले का प्रभाव दिखता है।दूसरी बात ये है कि आप साम्यवादी जीवन दर्शन से प्रभावित थे इसीलिए इनकी मूर्तियों में संघर्ष और द्वंद्व दिखता है,राय चौधरी ने श्रमिकों की समस्याओं को मूर्ति कला का विषय बनाया,उनकी सुप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा" श्रम की विजय" है। इसके अलावा "जब शीत ऋतु आती है" "सड़क बनाने वाले" मूर्ति में करुणा के भाव झलकते हैं। देवी प्रसाद राय चौधरी  पहले भारतीय मूर्तिकार थे जिन्होंने  कांस्य मूर्तियों को बनाया।दिल्ली में दांडी मार्च की प्रतिमा,तिरुअनंतपुरम  में चिथिरा थिरूनल  बलराम वर्मा द्वारा मन्दिर प्रवेश की घोषणा


इनकी कुछ महापुरुषों जैसे पर्सी ब्राउन,जगदीश चन्द्र बोस,एनी बेसेंट,महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू की आवक्ष प्रतिमा अद्वितीय है। 1925 के आसपास आपकी गिनती प्रथमकोटि के मूर्तिशिल्पियों में होती थी।

इनकी चित्रकला में सौंदर्य हाव भाव का बड़ा स्वाभाविक चित्रांकन है- इनमें  'भूतिया औरत', 'तिब्बत की बालिका', नेपाली लड़की' , 'लेपचा कुमारी', 'स्नेह स्निग्ध' आदि चित्रों में उज्ज्वल आभा, एक कलाकार का सुनहरा स्वप्न दिखाई पड़ता है। 'तूफ़ान के बाद' ,'आरती', 'स्नानघाट' आदि चित्र आपकी विभिन्न रूचियों के द्योतक हैं।

1937 में चेन्नई में शिक्षण कार्य के दौरान इन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा (एमबीई) “मोस्ट एक्सीलेंट आर्डर ऑफ़ द ब्रिटिश एम्पायर” का विशेष सम्मान भी हासिल हुआ । 

स्वर्गीय रायचौधरी जब 59 वर्ष के थे ,तो उन्हें कला निष्ठता के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने 1958 में पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया। 1962 में आप ललित कला अकादमी के फेलो भी चुने गए। 

15 अक्टूबर 1975 को कलकत्ता में इन महान आर्टिस्ट का निधन हो गया,इस समय वो 76 वर्ष के थे।


जामिनी रॉय -




जामिनी रॉय भारत के वबंगाल स्कूल के  महान चित्रकारों में से एक थे।  उन्हें 20वीं शताब्दी के महत्‍वपूर्ण आधुनिकतावादी कलाकारों में एक माना जाता है।  जिन्‍होंने अपने समय की कला परम्‍पराओं से अलग एक नई शैली स्‍थापित करने में अहम् भूमिका निभाई।  वे महान चित्रकार अबनिन्द्रनाथ टैगोर के सबसे प्रसिद्ध शिष्य थे। 

सन 1903 में 16 वर्ष की आयु में जामिनी रॉय ने कोलकाता के ‘गवर्नमेंट स्कूल ऑफ़ आर्ट्स’ में दाख़िला लिया, जिसके प्रधानाचार्य पर्सी ब्राउन थे।  ‘बंगाल स्कूल  ऑफ़ आर्ट’ के संस्थापक अबनिन्द्रनाथ टैगोर इस विद्यालय के उप-प्रधानाचार्य थे।  इनका जन्म 11 अप्रैल 1887 को बांकुड़ा ज़िला, पश्चिम बंगाल में हुआ था। 

उन्हें ‘ललित कला अकादमी’ का पहला फेलो सन् 1955 में बनाया गया। ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’, संस्कृति मंत्रालय और भारत सरकार ने उनके कृतियों को सन् 1976 में बहुमूल्य घोषित किया। 


उन्‍होंने साधारण ग्रामीणों और कृष्णलीला के चित्र बनाए और महान ग्रंथों के दृश्‍यों, क्षेत्र की लोक कलाओं की महान हस्तियों को चित्रित किया और पशुओं को भी बड़े विनोदात्‍मक तरीके से बड़े विनोदात्‍मक तरीके से प्रस्‍तुत किया। 


उनकी कला की प्रदर्शनी पहली बार सन् 1938 में कोलकाता के ‘ब्रिटिश इंडिया स्ट्रीट’ पर लगायी गयी. 1940 के दशक में वे बंगाली मध्यम वर्ग और यूरोपिय समुदाय  में बहुत मशहूर हो गए। 


उनके कला की प्रदर्शनी लन्दन में सन् 1946 में आयोजित की गयी और उसके बाद सन 1953 में न्यूयॉर्क सिटी में भी उनकी उनकी कला प्रदर्शित की गयी।  उनकी कई  कृतियां निजी और सार्वजनिक संग्रहण जैसे विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम लन्दन में भी देखी जा सकती हैं। 

इनकी प्रसिद्ध कृतियाँ - झींगा साझा करती बिल्लियां , गोपीनी, कृष्ण और बलराम, नृत्य करते कृष्ण और राधा , गोपी के साथ कृष्ण नाव में , मकर , बाघ पर रानी, रावण, सीता और जटायु, साड़ी में बैठी महिला, वैष्णव, वर्जिन और चाइल्ड, योद्धा राजा, माँ और बालक , तीन महिलाएं और बालक ,आश्चर्य,भारत हैं। 

इस महान् चित्रकार का निधन 24 अप्रैल, 1972 को कोलकाता में हुआ। 

 यहां ब्लॉग के बड़ा होने के कारण बस दो ही कलाकारों को ले रहे हैं अगले ब्लॉग में हम दूसरे कलाकारों पर भी चर्चा करेंगे यहाँ मैंने अपने पिछले ब्लॉग का लिंक भी दिया है अतः आप एक बार उसे भी पढ़ लें। 

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